आज आपके समक्ष दो शेर प्रस्तुत करने की इच्छा हुई.
१.
उनकी दोस्ती का कहर.. कुछ इस कदर बरपा हम पर
के अब जी सकते हैं न मर सकते हैं
अरे दुश्मन होता तो दो-दो हाथ भी कर लेते
पर उस सितमगर के आगे तो.. सर भी नही उठा सकते हैं.
२.
उन्हें शिकायत है हमसे
कि हम उनसे कतराते हैं
कोई उनसे ये तो पूछे कि वो
हमे करीब ही कब बुलाते हैं.
----------------
ये दोनों शेर मैंने अपने स्नातक शिक्षण काल (1989-1992) में लिखे थे.
१.
उनकी दोस्ती का कहर.. कुछ इस कदर बरपा हम पर
के अब जी सकते हैं न मर सकते हैं
अरे दुश्मन होता तो दो-दो हाथ भी कर लेते
पर उस सितमगर के आगे तो.. सर भी नही उठा सकते हैं.
२.
उन्हें शिकायत है हमसे
कि हम उनसे कतराते हैं
कोई उनसे ये तो पूछे कि वो
हमे करीब ही कब बुलाते हैं.
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ये दोनों शेर मैंने अपने स्नातक शिक्षण काल (1989-1992) में लिखे थे.
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