Thursday, 14 April 2016

सुकून !!!

नीलाम करके खुद्दारी को
जो पायी है हमने बदले में I
उस 'हैसियत' का ही शोर है
जो सुकून आने नहीं देता II

या यूँ , कि मिटाए नहीं मिटता
उस 'खरीदार' का अक्स I
एहसास के रंग जो उकेर देते हैं
तन्हाई की उस  दीवार पर II

लेखन : विवेक सिंह 

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