नीलाम करके खुद्दारी को
जो पायी है हमने बदले में I
उस 'हैसियत' का ही शोर है
जो सुकून आने नहीं देता II
या यूँ , कि मिटाए नहीं मिटता
उस 'खरीदार' का अक्स I
एहसास के रंग जो उकेर देते हैं
तन्हाई की उस दीवार पर II
लेखन : विवेक सिंह
जो पायी है हमने बदले में I
उस 'हैसियत' का ही शोर है
जो सुकून आने नहीं देता II
या यूँ , कि मिटाए नहीं मिटता
उस 'खरीदार' का अक्स I
एहसास के रंग जो उकेर देते हैं
तन्हाई की उस दीवार पर II
लेखन : विवेक सिंह
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