हा !
जब जब इतिहास छुपाया जाता है,
तब तब कोई गौरव मिटाया जाता
है II
जब मिथ्या के बल कुछ हथियाया
जाता है,
तब एक सत्य झुठलाया जाता है II
कहीं जब दम्भ की पुष्टी की जाती है,
तब किसी स्वाभिमान की बली ली
जाती है II
जब स्वार्थ-सिद्धी ही ध्येय
हो जाता है,
तब हित-हत्या का कुचक्र चलाया
जाता है II
जब किसी धृतराष्ट्र का अभिषेक कराया जाता है,
तब किसी पांडव को लाक्षागृह
पहुंचाया जाता है II
जब जब कोई चीर-हरण होता है,
तब तब मानवता का पौरुष-मरण
होता है II
जब अनर्थ समाज में सम्मानित होता है,
तब अर्थ कहीं चीत्कार कर रोता
है II
जब न्याय-तुला का संतुलन खोता
है,
तब विवेक भी दिग्भ्रमित होता
है II
जब गौरव, स्वाभिमान, हित, पौरुष, अर्थ, विवेक खोकर भी जनमानस निश्चिन्त सोता है,
समझने में कठिनाई नही की ऐसा
समाज निर्लज्ज, निर्वीर्य और
नपुंसक होता है II
लेखन - विवेक सिंह

बिलकुल सही लिखा है आप ने विवेक जी
ReplyDeleteसही लिखा है आप ने विवेक जी.!
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