लम्बे समय से मैं एक तर्क सुनता आया हूँ कि हम फलां विषय या समस्या के बारे में बाद में भी बात कर सकते हैं क्योंकि अभी राष्ट्र के सामने दूसरे आवश्यक विषय भी हैं. और यह तर्क हिंदू संस्कृति के संदर्भ में विशेष रूप से प्रयोग किया जाता है. यह सही है की राष्ट्र की प्राथमिकताएं सर्वोपरी है. लेकिन प्रश्न है की इन प्राथमिकताओं को तय किस आधार पर किया जाता है. उत्तर में एक स्वाभाविक तर्क सुनने को मिलता है कि महंगाई, भूख, भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी, आतंकवाद इत्यादी अधिक ज्वलंत विषय हैं. इसमें कोई दो राय नहीं की ये सभी अति महत्पूर्ण विषय है. पर क्या अब तक कोई भी शासन इन समस्याओं को दूर करने में समर्थ रहा है? नहीं. ऐसी स्थिति में दूसरे विषय जिन्हे कम महत्वपूर्ण माना जाता है, कब कार्यान्वयन सूची में आएंगे?
'प्राथमिकता' का यह तर्क मेरी समझ से परे है. उदाहरण के लिए कश्मीर की समस्या का आज का स्वरूप, आज हिंदुओं के कुछ मुख्य मंदिरों के मुद्दों का विकराल रूप ले लेना भी ऐसे ही 'प्राथमिकता' के गान का परिणाम है. यदि सरदार पटेल की योजना से कार्य होता तो स्वतंत्रता के पहले दशक में ही ये विवाद सुलझ गए होते. लेकिन तब भी इस प्राथमिकता की दुहाई दी गई थी. यदि समान नागरिक आचारसंहिता स्वतंत्रता के प्रारम्भिक वर्षों में लागू कर दी गयी होती तो आज सामाजिक ढांचा सम्भवत: बेहतर होता.
एक विषय आजकल सामने आ रहा है वह है 'लव जिहाद' का. आज इसके विरुद्ध सामाजिक संचार माध्यमों पर बहस चल रही है. निसंदेह इस समस्या के मूल में विभिन्न धार्मिक मान्यताएं हैं, और इसी कारण यह विषय भी बुद्धिजीवियों की 'प्राथमिकता' वाली कार्यान्वयन सूची में नहीं है. किन्तु, यदि हम इसे धार्मिक दृष्टिकोण से न देखें तो भी निश्चित ही यह समाज में स्त्रियों के प्रति किये अमानवीय दुर्व्यवहार की श्रेणी में आने वाले कृत्यों में से एक है. अत: यह एक सामाजिक व्यवस्था का विषय है जिसको सुलझाने में विलम्ब इसे और विकराल रूप दे सकता है. यदि मैं अपने व्यक्तिगत जानकारी को आधार मानूं तो यह 'लव जिहाद' की आयु भारत में २५ से ३० वर्ष है. तो कब इस विषय को प्राथमिकता दी जाएगी?
यह मानना पड़ेगा की हमारा देश बड़ा है, जनसंख्या बड़ी है, विविधतायें बड़ी हैं. अत: हमारे राष्ट्र के सामने ज्वलंत विषय भी अधिक हैं. हमारी आवश्यकता ऐसे तंत्र की है जो निराकरण शीघ्रातिशीघ्र करने में जुटे, न की 'प्राथमिकताओं' के छद्म पाश में उलझा दे. जिन विषयों को 'प्राथमिकता' के नाम पर टाल दिया जाता है, वह तो दिन प्रतिदिन और बढ़ती जाती है और एक दिन विकराल रूप धारण कर लेती है. समझने कि आपश्यकता है की इस रवैये से निराकरण में विलम्ब होता है, जबकी जिन्होंने समस्या को जन्म दिया है वे तो अपने कार्य में लगे रहते है. कोई भी निर्णय देश, काल और पात्र के आधार पर ही तय किया जाना चाहिए ऐसा नीति कहती है. अत: शासन को 'प्राथमिकताओं' का मानदंड बदलना चाहिए और 'डू वाट एवर इट टेक्स' की कार्यशैली को अपनाना चाहिए. ऎसी व्यवस्था बनानी चाहिए कि जख्म को नासूर न बनने दे और उसका निराकरण पहले ही कर दे. अंग्रेज़ी में एक कहावत है 'निप डी इविल इन द बड'. यदि ऐसा नहीं करेंगे तो 'इविल' आज तक अपनायी गई 'प्राथमिकता' की कार्यशैली द्वारा पोषित ही होगा.
'प्राथमिकता' का यह तर्क मेरी समझ से परे है. उदाहरण के लिए कश्मीर की समस्या का आज का स्वरूप, आज हिंदुओं के कुछ मुख्य मंदिरों के मुद्दों का विकराल रूप ले लेना भी ऐसे ही 'प्राथमिकता' के गान का परिणाम है. यदि सरदार पटेल की योजना से कार्य होता तो स्वतंत्रता के पहले दशक में ही ये विवाद सुलझ गए होते. लेकिन तब भी इस प्राथमिकता की दुहाई दी गई थी. यदि समान नागरिक आचारसंहिता स्वतंत्रता के प्रारम्भिक वर्षों में लागू कर दी गयी होती तो आज सामाजिक ढांचा सम्भवत: बेहतर होता.
एक विषय आजकल सामने आ रहा है वह है 'लव जिहाद' का. आज इसके विरुद्ध सामाजिक संचार माध्यमों पर बहस चल रही है. निसंदेह इस समस्या के मूल में विभिन्न धार्मिक मान्यताएं हैं, और इसी कारण यह विषय भी बुद्धिजीवियों की 'प्राथमिकता' वाली कार्यान्वयन सूची में नहीं है. किन्तु, यदि हम इसे धार्मिक दृष्टिकोण से न देखें तो भी निश्चित ही यह समाज में स्त्रियों के प्रति किये अमानवीय दुर्व्यवहार की श्रेणी में आने वाले कृत्यों में से एक है. अत: यह एक सामाजिक व्यवस्था का विषय है जिसको सुलझाने में विलम्ब इसे और विकराल रूप दे सकता है. यदि मैं अपने व्यक्तिगत जानकारी को आधार मानूं तो यह 'लव जिहाद' की आयु भारत में २५ से ३० वर्ष है. तो कब इस विषय को प्राथमिकता दी जाएगी?
यह मानना पड़ेगा की हमारा देश बड़ा है, जनसंख्या बड़ी है, विविधतायें बड़ी हैं. अत: हमारे राष्ट्र के सामने ज्वलंत विषय भी अधिक हैं. हमारी आवश्यकता ऐसे तंत्र की है जो निराकरण शीघ्रातिशीघ्र करने में जुटे, न की 'प्राथमिकताओं' के छद्म पाश में उलझा दे. जिन विषयों को 'प्राथमिकता' के नाम पर टाल दिया जाता है, वह तो दिन प्रतिदिन और बढ़ती जाती है और एक दिन विकराल रूप धारण कर लेती है. समझने कि आपश्यकता है की इस रवैये से निराकरण में विलम्ब होता है, जबकी जिन्होंने समस्या को जन्म दिया है वे तो अपने कार्य में लगे रहते है. कोई भी निर्णय देश, काल और पात्र के आधार पर ही तय किया जाना चाहिए ऐसा नीति कहती है. अत: शासन को 'प्राथमिकताओं' का मानदंड बदलना चाहिए और 'डू वाट एवर इट टेक्स' की कार्यशैली को अपनाना चाहिए. ऎसी व्यवस्था बनानी चाहिए कि जख्म को नासूर न बनने दे और उसका निराकरण पहले ही कर दे. अंग्रेज़ी में एक कहावत है 'निप डी इविल इन द बड'. यदि ऐसा नहीं करेंगे तो 'इविल' आज तक अपनायी गई 'प्राथमिकता' की कार्यशैली द्वारा पोषित ही होगा.

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