Monday, 10 December 2018

अब अव्यक्त को व्यक्त करता हूं


यह अभिव्यक्ति है एक उल्लास की, जिसे भावनाओं के ताने बाने को
सहेजे एक छोटे से 'विस्तृत' परिवार ने अपने अंतर में अनुभव किया


अब अव्यक्त को व्यक्त करता हूं
चलो लेखनी को भोजपत्र पर धरता हूं

हे गणपति "गन्नू" जी, प्रणाम साष्टांग आपको
भरा है उपवन सा, भावनामयी हमारी मरुधरा को

नारायण सम आभामयी, जल जनित नीरजा
वंदनीय शक्ति आयी, अंजू सम आसन बना

मीन सम नयन में, होगी स्वाभाविक द्युति
बिखेरेगी सब ओर, भाव पुष्प यह भारती

आनंदमयी ममत्व आया है ऋतू सुन्दर शरद में
मधुकर आनंदित हो जैसे मधुर मकरंद में

दृढ़ विश्वास उस घनश्याम में नहीं है नया
देवों की अनुकम्पा है, स्वयं सारिका है सौजन्या

हरमीत उठाये हाथ दे सबको ताली
अमित शुभकामनाएं तुमको प्रिय शेफाली

प्रेरणा से आभा की, हो रहा है यह उल्लेख
रचना करता है मोनिका-संगी यह विवेक

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