नहीं निकलते सज-धज के हम रोज़ाना अपने ही गलियारों में ।
होली-दिवाली की तारीखें भी ढून्ढते हैं हम पोथी और अखबारों में ।।
जीना होगा देश भक्ति को अपनी सान्स के तारों में।
तो क्यों न लगा डाले...एक तिरन्गा अपने छत-चौबारे में।।
होली-दिवाली की तारीखें भी ढून्ढते हैं हम पोथी और अखबारों में ।।
जीना होगा देश भक्ति को अपनी सान्स के तारों में।
तो क्यों न लगा डाले...एक तिरन्गा अपने छत-चौबारे में।।
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